सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

एकदिनी किक्रेट की तरह है काव्यमंच (ब्लाग की किसी भी सामग्री का लेखक की बगैर अनुमति के प्रयोग दण्डनीय अपराध है।)
अभी हलही में एक कवि और गीतकार से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो देश भर में अपनी कविता का जादू बिखेर रहे हैं। उनके चाहने वाले देश के साथ-साथ ही विदेशों तक में फैले हुए हैं। उनकी एक कविता जो मील का पत्थर साबित हुई है। हो सकता है आप लोगों नें भी सुनी हो कविता की लाइनें हैं कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है मगर धरती की बेचैनी को सिर्फ अंबर समझता है..... उनका नाम है डॉ। कुमार विश्वास इस कविता में पता नहीं कौंन सा जादू है कि जो एक बार सुन लेता है वो इसे गुनगुनाने को मजबूर हो जाता है। एक वाक्या आपसे बताता हूं जो इसी कविता से संबंधित है। मैं अपने घर गया था जो लखनऊ के पास सीतापुर जिले में पड़ता है वहां पर कुछ बात चल रही थी तो मैंने इस कविता की पहली लाइन कही इतने में हमारे मैसी के लड़के ने अपने फोन में इस कविता की पूरी रिकार्डिंग सुनाई मैंने उससे पूछा क्या तुम जानते हो ये कविता किसने लिखी है तो उसका जवाब था नहीं लेकिन सुनने में बहुत अच्छी लगती है। फिर मैंने उसको बताया कि ये कविता देश के बहुत चर्चित कवि डॉ। कुमार विश्वास जी की हैं। हमारे आफिस में भी एक सज्जन मुझे इसी कविता को गुनगुनाते मिले उनसे मैंने सवाल किया कि ये आप क्या गुनगुना रहे हैं तो उनका जवाब था ये एक कविता है जो मुझे बहुत अच्छी लगी मैं इसकी पूरी रिकार्डिंग सुनना चाहता हूं। उन्होंने ऐसी ही तमाम कवितायें लिखी हैं। हां तो मैं बता रहा था कि उनसे मिलने मैं गया था जहां बहुत सारे विषयों पर बातचीत हुई जिसमें मीडिया से लेकर आतंकवाद तक पर काफी चर्चा हुई। इसी दौरान बात आज जो हास्य के नाम पर टीवी परोसा जा रहा है उस पर भी पहुंची जिस पर डॉ।साहब की प्रतिक्रिया काबिले तारीफ थी उनका कहना था हास्य के नाम पर फूहड़ता दिखाने या सुनाने का हक हमको नहीं है। हमको अपनी बात को बड़े शालीन तरीके से श्रोताओं या दर्शकों के सामने रखनी चाहिये। उनका कहना था कि श्रोताओं की तालियों के मुझे कुछ भी बोलने का हक नहीं है मदियादा में रह कर लोगों को ज्यादा आनंदित किया जा सकता है। उनका कहना है कि काव्य मंच बिल्कुल एकदिनी क्रिकेट के समान है जिसमें आपके चारों ओर आपको हराने के लिए लोग कतार बध्द खड़े होते हैं,और आपके पास सिर्फ कुछ मिनट का समय होता है उसी समय में आपको अपने जीभ रूपी बल्ले से सबके छक्के छुड़ाने होते हैं । अगर आपकी कविता में दम है तो लोग खुद ही ताली बजाने पर मजबूर हो जाते हैं,औऱ वन्समोर की आवाज आने लगती फिर वही चंद मिनट कब घंटों में बदल जाते हैं कहना मुश्किल है। इसे कहते हैं फलां आदमी छा गया।


लेखक विवेक वाजपेयी (मुसाफिर) टीवी पत्रकार और डॉ.कुमार विश्वास की बातचीत पर आधारित

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