शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

बहुत याद आए प्रभाष जी...


बहुत याद आए प्रभाष जी...
(विवेक वाजपेयी)
किसी को कभी भी याद किया जा सकता है। लेकिन हम बात खास उस जगह की कर रहे हैं जहां पर प्रभाष जी को याद करने के लिए ही लोग एकत्रित हुए थे। स्थान था दिल्ली में बापू की समाधि राजघाट के ठीक सामने स्थित गांधी स्मृति के सत्याग्रह मंडप का। जहां पर प्रभाष परंपरा न्यास ने स्वर्गीय प्रभाष जी के जन्मदिन के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। जिसमें करीब हर वर्ग के लोग मौजूद थे। वयोवृद्ध गांधी वादी लोगों से लेकर आज की युवा पीढ़ी तक सभी। देश की मीडिया के जाने माने लोगों से लेकर पत्रकारिता में कदम रखने वाले युवा भी। इसके साथ ही प्रबुद्ध साहित्यकार और प्रसिद्ध आलोचक भी जिनमें अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह को मैं भली-भांति जान सका । प्रभाष जी के पत्रकारिता को दिए गए योगदान की चर्चा लोगों ने अपने अपने ढंग से की। लोगों ने अपने-अपने संस्मरण भी सुनाए। बतातें हैं कि प्रभाष जी को तीन चीजे जिंदगी भर बहुत पसंद रहीं। वो थी लोगों से बतियाना, खाना खिलाना और शास्त्रीय संगीत सुनना। इस कार्यक्रम में प्रभाष जी की तीनों पसंदों का ख्याल रखा गया था। तभी तो पंडित कुमार गंधर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र के गायन और मालवा की दाल बाटी की भी व्यवस्था की गई थी । और कार्यक्रम में गांधीवादी लोगों की मौजूदगी। कार्यक्रम में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने प्रभाष का सही अर्थ समझाते हुए व्याख्या की। उन्होंने बताया कि प्रभाष का मतलब, शाब्दिक अर्थ डिस्क्लोज करना होता है, रिवील करना होता है। यही तो करते रहे प्रभाष जी जीवन भर, खुलासे करते रहे। उदघाटित करते रहे। नामवर की यह व्याख्या सबको भाई। लोक धुनों, लोक संगीत, लोक जीवन के प्रति प्रभाषजी के प्रेम को नामवर ने अच्छे तरीके से बताया-सुनाया। ये व्याख्यान मैं नहीं सुन सका क्योंकि मैं कार्यक्रम में थोड़ी देर से पहुंचा था लेकिन एक हमारे मित्र यशवंत भाई ने खाना खाते हुए ये ब्याख्या सुनाई सो मैंने लिख दी।
प्रभाष जी के जन्म दिवस के मौके पर उनकी तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। जिसमें उनकी पुस्तक आगे अंधी गली है का लोकार्पण सांसद एवं पत्रकार एचके दुआ ने किया। 21 वी सदी पहला दशक और मसि कागद ने नए संस्करण का विमोचन योगाचार्य स्वमी विद्यानंद ने किया। इसके साथ ही न्यास के प्रबंध न्यासी रामबहादुर राय जी ने संस्था के उद्देश्यों को बताया। साथ ही उन्होंने बताया कि पैसे के बदले खबर पर जोशी की मुहिम का नतीजा रहा कि प्रेस काउंसिल की ओर से 72 पेज की रपट दी है जो देश भर की हालात उजागर करती है। लेकिन बड़े मीडिया घरानों के दबाव में दूसरी 12 सदस्ययी टीम बनी जिसने महज 12 पेज की रिपोर्ट तैयार की। कार्यक्रम के अंत में मुकुल शिवपुत्र का गायन हुआ जिसने लोगों को मंत्रमुग्ध किया और फिर नंबर आया प्रभाष जी की लोगों प्रेम-पूर्वक आवभगत करने का यानि भोजन कराना इन्ही खास गुणों के चलते लोग उनको इतना चाहते थे और आज भी चाहते हैं। उनका लगाव और अपनत्व ही तो था जो उनके विदेशी मित्र भी फाइव स्टार की ऐशो आराम छोड़कर उनके पास थोड़ी सी ही जगह से अर्जेस्ट करके रहने आ जाया करते थे। हैं तो बात खाने की हो रही थी कार्यक्रम स्थल के दांयी तरफ लजीज खाने की व्यवस्था थी। जहां पर लोग तरह-तरह के व्यंजन का स्वाद ले रहे थे। लेकिन लोगों को फुस्फुसाते हुए मैंने सुना कि कुल्फी खाई की नहीं अरे भाई कुल्फी तो बड़ी मस्त है। जरुर खाना। कुल्फी के स्टाल पर कुछ अधिक ही भीड़ लगी थी। खाना खाकर जैसे ही प्लेट रखी हमारे न्यूज हेड को शायद कुल्फी वाली बात किसी से पता चल गई थी सो उन्होंने कहा विवेक सुना है कुल्फी बहुत बढ़िया है। मैने कहा ठीक है आप रुकिये मैं लाता हूं। और लाइन में लग गया लाइन में लगे लगे मारे गर्मी के हालात खराब हो रहे थे लेकिन कुल्फी ले जाना जरुरी था इसलिए लाइन गर्मी की परवाह किए बिना लगा रहा और करीब 30 मिनट बाद एक कुल्फी मेरे हांथ आ गई। वो कुल्फी सर के हवाले कर मैं दोबारा मुस्तैद हुआ और पहले की अपेक्षा जल्दी सफलता हांथ लग गई। जब कुल्फी को मुह से लगाया तो अहसास हुआ कि आखिर क्यों इतनी तगड़ी लाइन थी। वाह गजब का स्वाद था उस कुल्फी मीं लग रहा था शायद उस कुल्फी में प्रभाष जी की मिठास घुल गई थी। हलांकि शायद प्रभाष जी की मिठास सभी को मीठी ना लगती हो खासकर उन्हें जिनके खिलाफ वो आवाज बुलंद करने से कभी नहीं डरे हमेशा सच के साथ डटे रहे। अब कार्यक्रम लगभग पूरा हो चुका था लोग अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान करने लगे थे। रात का करीब ग्यारह बज रहा था। इसलिए मैंने भी राय साहब से अभिवादन कर घर लौटने के लिए तैयार हो गया। तभी राय साहब ने अपनत्वपूर्वक पूंछा वाजपेयी घर कैसे जाओगे मैंने कहा सर मैं अपने न्यूज हेड के साथ आया हूं उन्हीं के साथ चला जाउंगा। उन्होंने कहा तो ठीक है। लेकिन राय साहब के वो शब्द दिल को छू गए जहां आज की मतलबी दुनियां में किसी को किसी की कोई मतलब नहीं होता हैं वहां आज भी ऐसे लोग हैं जो दूसरों के लिए इतना सोचते हैं। जबकि मेरी राय साहब से मुलाकात हुए करीब छह ही महीने हुए हैं। फिर भी उनको मेरे घर पहुंचने की चिंता थी जबकी आदमी एक छोटे से कार्यक्रम बहुत व्यस्त हो जाता है और उन्होंने तो इतना बढ़ा आयोजन किया। सारे रास्ते मैं यही सोचता रहा कि राय साहब में कितना अपनत्व है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी खबर पढ़कर बड़ी खुशी हुई क्यूकि हम वहां नहीं पहुंच पाये थे

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  2. विवेक जी, आपकी रिपोर्ट सजीव और उत्प्रेरक है। मौका भले ही प्रभाष जी के जन्मोत्सव का रहा हो किन्तु भाव से ओतप्रोत लेखन के लिए बाजी आपने मार ली। साथ ही आपको सावधान करना चाहता हूं, स्वनाम धन्य श्री राम बहादुर राय साहब से किसी भी मामले में आप तुलना न करने लगें...राय साहब सूरज हैं...आप अभी दीपक भी नहीं। सजीव लेखन के लिए साधुवाद!!
    Dr. Manoj Sharma

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  3. डॉ साहब आपको रिपोर्ट अच्छी लगी इसके लिए आपको धन्यवद। लेकिन आपने जो आगे लिखा है उससे मैं कतई सहमत नहीं हूं। राय साहब में मेरी क्या बड़े-बड़ों की तुलना नहीं की जा सकती है। वो अतुलनीय ज्ञान का सागर हैं। मुझे जब भी वक्त मिलता है ज्ञान की कुछ बूदें लेने पहुंच जाता हूं। वो मेरे बहुत आरदणीय हैं। आपकी टिप्पणी की नीचे की लाइनों
    ने मुझे दुख पहुंचाया है।
    vivek vajpayee

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  4. भाई बाजपेयी जी मान गए आपको गजब की रिपोर्ट लिखी है आपने ऐसा लग रहा हो जैसे पढ़ने वाला खुद वहीं कार्यक्रम में मौजूद हो। आपने शब्दों के माध्यम से क्या गजब की तस्वीर पेश की है। इसके लिए आपका धन्यवाद और आपकी अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।

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